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विक्रमशिला के महान् आचार्य दीपंकर श्री ज्ञान अतिश

आचार्य दीपंकर श्रीज्ञान अतिश विक्रमशिला बौद्ध महाविहार के उच्च पदस्थ आचार्य थे जिनकी ख्याति सम्पूर्ण देश-विदेश में थी। 10 वीं शताब्दी के इस महान् आचार्य को बौद्ध धर्म का अंतिम प्रमुख विद्वान् माना जाता है जिनके अवसान के बाद देश में बौद्ध धर्म की अवनति होती गयी। तिब्बत के राजा के आमंत्रण पर आचार्य दीपंकर ने वहाँ 13 वर्षों...

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विक्रमशिला आज भी कुछ कह रही है

आज भी इस महाविहार के मुख्य स्तूप के प्रकाष्ठों से बोध मन्त्रों की ध्वनियाँ निःसृत होती सी प्रतीत होती है
जिनकी अनुगूँज कभी पुरे विश्व में फैली थी|

डॉ० बी० एस० वर्मा

विक्रमशिला की उत्खनन टीम

11वीं-12वीं शताब्दी में तुर्क आक्रांताओं के द्वारा विध्वंस किये जाने के बाद करीब 7-8 सौ वर्षों तक विश्वविख्यात ज्ञान केंद्र रहा विक्रमशिला बौद्ध महाविहार जमीन के अंदर पड़ा दुनिया की नजरों से ओझल रहा जिसे पुन: उजागर करने का श्रेय भारतीय पुरातत्व विभाग, भारत सरकार के निदेशक रहे डा भगवती शरण वर्मा अर्थात् डा बीएस वर्मा को जाता है जिन्होंने 1971 से लेकर 1982 तक बिहार के भागलपुर जिला के कहलगांव के अंतीचक ग्राम में फील्ड डायरेक्टर के रूप में कैम्प कर भारत सरकार के भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के इस महती उत्खनन परियोजना को अंजाम तक पहुंचाया तथा विक्रमशिला के लोकेशन पर उठ रहे सारे प्रश्नों पर विरामचिन्ह लगा दिया। इसके पूर्व जहां श्री दीक्षित जैसे पुराविद् और अलका चट्टोपाध्याय सरीके विद्वान वर्तमान बांग्लादेश स्थित सोमपुरा विहार की पहचान विक्रमशिला के रुप में कर रहे थे तो कनिंघम इसे सिलाव, विद्याभूषण और एससी दास सुलतानगंज तथा बनर्जी शास्त्री सरीखे विद्वान इसे हुलासगंज के निकट केऊर के निकट इसका लोकेशन बता रहे थे।
15 जून,1926 को जन्में डा वर्मा ने 1952 में पटना विश्वविद्यालय से प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व विषय में एम ए की उपाधि प्राप्त की और 1958 में पीएच-डी किया। पटना विश्वविद्यालय में व्याख्याता पद से कैरियर प्रारंभ कर वे ए एस आई में पाटरी असिस्टेंट, बिहार पुरातत्व विभाग में उत्खनन एवं अन्वेषण अधिकारी के पदों पर काम करते हुए ए एस आई के अधीक्षण पुराविद् व निदेशक के पदों को सुशोभित किया।
डा वर्मा बिहार के कुम्हरार और सोनपुर तथा नागार्जुन कोण्डा उत्खनन परियोजनाओं से नजदीकी से जुड़े रहे। बिहार के चिरांद में 1600 बीसी की नवपाषाणकालीन सभ्यता को उजागर न सिर्फ स्वयं ख्याति अर्जित की,वरन् बिहार की पुरातात्विक महत्ता को देश-दुनिया के नक्शे पर प्रतिष्ठित किया। किंतु विक्रमशिला की खुदाई से उन्हें सर्वाधिक ख्याति मिली और कनाडा आदि देशों में व्याख्यान के अवसर मिले।
डा वर्मा द्वारा की गई विक्रमशिला की खुदाई की रिपोर्ट "अंतीचक एक्सावेशंस" के नाम से ए एस आई के द्वारा प्रकाशित है। इसके अलावे बिहार के सामाजिक आर्थिक धार्मिक इतिहास, सोनपुर उत्खनन आदि पर भी उनकी पुस्तकें प्रकाशित हैं। कई प्रतिष्ठत जर्नलों और पुस्तकों में उनके लेख प्रकाशित हैं।